बस्तर में आस्था का उत्सव: आमाजोगानी’ के बिना आम चखना भी वर्जित, पूर्वजों को फल अर्पित कर शुरू हुआ ‘मरका पंडुम’

भानुप्रतापपुर। प्रकृति और संस्कृति के अनूठे संगम के लिए विख्यात बस्तर अंचल में इन दिनों चैत्र उत्सव की धूम है। यहाँ के जनजीवन में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने की परंपरा आज भी उतनी ही जीवंत है जितनी सदियों पहले थी। इसी कड़ी में, बस्तर के विभिन्न गांवों में ‘आमाजोगानी’ अथवा ‘मरका पंडुम’ (आम का त्योहार) बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। भानुप्रतापपुर व दुर्गुकोंडल क्षेत्र के ग्राम लोहत्तर सोनादई, बांसला में ग्रामीणों ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर इस वर्ष के आम के फल को स्वीकार किया।

प्रकृति की अनुमति के बिना फल तोड़ना वर्जित
बस्तर की आदिवासी संस्कृति में अनुशासन और आस्था का गहरा तालमेल देखने को मिलता है। यहाँ परंपरा है कि जब तक मरका पंडुम नहीं मना लिया जाता, तब तक कोई भी ग्रामीण पेड़ों से आम, महुआ, चार या इमली जैसे फल नहीं तोड़ता। गोंडी भाषा में ‘मरका’ का अर्थ ‘आम’ और ‘पंडुम’ का अर्थ ‘उत्सव’ होता है।
ग्रामीणों की अटूट मान्यता है कि यदि पूजा से पहले फल तोड़े गए, तो ग्राम देवता रुष्ट हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में गांव में महामारी फैलने या पशुधन की हानि होने का भय बना रहता है। परंपरा की अवहेलना करने पर कई गांवों में आज भी सामाजिक दंड का प्रावधान है।

नदी-नालों के किनारे पूर्वजों का तर्पण
इस उत्सव की शुरुआत सुबह से ही हो जाती है। ग्रामीण नदी या तालाबों के किनारे एकत्र होते हैं। वहां अपने उन पूर्वजों को याद किया जाता है जिन्होंने वर्षों पहले पेड़ों को रोपित किया था।
विधि-विधान: नदी किनारे पूजा सामग्री के साथ ग्रामीण अपने पूर्वजों को नए फल (आम, महुआ, चार) अर्पित करते हैं।
तर्पण: पूर्वजों को जल अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।
विशेष रस्म: नाले के पास जामुन की लकड़ी गाड़कर उसके नीचे धान से भरे दोने रखे जाते हैं और दीपक जलाकर पूर्वजों का आशीर्वाद लिया जाता है।

प्रसाद में गुड़ और आम की मिठास
पूजा के मुख्य पड़ाव में ग्रामीण किसी विशाल आम के पेड़ के नीचे एकत्रित होते हैं। वहां सामूहिक पूजा के बाद पहली बार पेड़ से आम तोड़े जाते हैं। आम की फांकियां काटकर उसमें गुड़ मिलाती हैं, जिसे ‘आमा चखनी’ के रूप में सभी ग्रामीणों को प्रसाद स्वरूप वितरित किया जाता है। इसके पश्चात ही पूरे बस्तर में आम खाने की शुरुआत आधिकारिक रूप से मानी जाती है।

वृक्षारोपण और संरक्षण का संदेश
बस्तर के जानकारों का कहना है कि मरका पंडुम केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण का भी प्रतीक है। यह त्योहार सिखाता है कि पेड़ों को लगाने वाले हमारे पूर्वज आज भी इन फलों के रूप में हमारे बीच जीवित हैं। पेड़ों की पूजा कर आदिवासी समाज आने वाली पीढ़ी को प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण का संदेश देता है।
“बस्तर की यह परंपरा विश्व को सिखाती है कि प्रकृति से कुछ भी लेने से पहले उसे सम्मान देना और अपने पूर्वजों के प्रति आभार व्यक्त करना कितना आवश्यक है।”
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