शासकीय अस्पताल अंतागढ़ बना सिर्फ ‘रेफर सेंटर’: सरकार ने डॉक्टर रामटेके के सिजेरियन ट्रेनिंग पर फुंके 2.50 लाख, 10 साल में एक भी ऑपरेशन नहीं!
यशवंत चक्रधारी

भानुप्रतापपुर। सरकारी खजाने से ढाई लाख रुपये का चूना कैसे लगाया जाता है और जनता के खून-पसीने की कमाई को कैसे पानी में बहाया जाता है, इसकी जीती-जागती मिसाल देखना हो तो शासकीय अस्पताल अंतागढ़ चले आइए! यहाँ पदस्थ डॉ. भेसेज रामटेके को सरकार ने बड़े चाव से 2.50 लाख रुपये खर्च करके सिजेरियन (ऑपरेशन से डिलीवरी) का विशेष प्रशिक्षण दिलाया था। मकसद बड़ा नेक था—इलाके की गरीब और ग्रामीण महिलाओं को डिलीवरी के लिए दर-दर न भटकना पड़े। लेकिन अफ़सोस, ट्रेनिंग पूरे हुए 10 साल से ज्यादा का वक्त बीत चुका है, और डॉक्टर साहब का ‘ऑपरेशन रिकॉर्ड’ आज भी शून्य पर अटका हुआ है!
ढाई लाख की ट्रेनिंग लेकर डॉक्टर साहब कागजों में तो ‘सिजेरियन एक्सपर्ट’ बन गए, लेकिन हकीकत में अंतागढ़ अस्पताल को सिर्फ एक ‘रेफरल सेंटर’ बनाकर रख दिया गया है। जैसे ही कोई प्रसूता गंभीर हालत में पहुँचती है, यहाँ कैंची और टांके चलाने के बजाय सीधे रेफर पर्ची थमा दी जाती है।

न खुद करेंगे, न दूसरे को आने देंगे!
सबसे कड़वी मिर्ची तो इस बात की लग रही है कि डॉक्टर रामटेके के नाम के आगे ‘सिजेरियन ट्रेंड’ का ठप्पा लगा होने के कारण स्वास्थ्य विभाग भी बेफिक्र सोया हुआ है। शासन-प्रशासन की फाइलों में दर्ज है कि “अंतागढ़ में तो सिजेरियन डॉक्टर मौजूद है”, इसलिए यहाँ किसी दूसरे सर्जन या डॉक्टर की तैनाती ही नहीं की जा रही। यानी डॉक्टर साहब न खुद ऑपरेशन करेंगे और न ही किसी दूसरे डॉक्टर को यहाँ आने का रास्ता बनने देंगे!
जनता के ढाई लाख पानी में, मरीज परेशान
सवाल यह उठता है कि जब 10 सालों में एक भी ऑपरेशन नहीं करना था, तो सरकार के ढाई लाख रुपये क्यों बर्बाद कराए गए? क्या वह ट्रेनिंग सिर्फ कागजी डिग्री बढ़ाने और प्रमोशन पाने का जरिया थी? आज अंतागढ़ और आसपास के वनांचल क्षेत्र की गरीब जनता को छोटी-मोटी पेचीदगियों में भी जिला अस्पताल या निजी नर्सिंग होम के चक्कर काटने पड़ रहे हैं, जहाँ उनसे मोटी रकम ऐंठी जाती है।
अगर 2.50 लाख रुपये खर्च करने के बाद भी अस्पताल में प्रसूताओं को चीर-फाड़ और सही इलाज के लिए तड़पना पड़े, तो ऐसे प्रशिक्षण और ऐसी व्यवस्था पर थूके बिना जनता नहीं रह सकती। स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों को नींद से जागना होगा—या तो डॉ. रामटेके से उस ढाई लाख रुपये का हिसाब और 10 साल का काम माँगा जाए, या फिर अंतागढ़ की बेबस जनता के लिए यहाँ किसी ऐसे डॉक्टर को भेजा जाए जो सच में कैंची चलाना जानता हो!
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