भानुप्रतापपुर निजी अस्पताल की लापरवाही से उजड़ा आदिवासी परिवार; मां-बच्चे की मौत के बाद भी कठोर कार्रवाई का इंतजार

भानुप्रतापपुर। दुर्गूकोंदल ब्लॉक के कमलेश कोमरा के घर जल्द ही बच्चे की किलकारी गूंजने वाली थी। खुशियों के इस पल का इंतजार पूरा परिवार बेताबी से कर रहा था, लेकिन किसे पता था कि बेहतर इलाज की आस में लिया गया एक फैसला पूरे परिवार को हमेशा के लिए उजाड़ देगा। निजी अस्पताल की घोर लापरवाही और लचर प्रशासनिक रवैये के कारण एक मां और उसके नवजात शिशु की जान चली गई, जिससे पूरे परिवार में मातम पसरा हुआ है।
15 जून को कमलेश कोमरा अपनी गर्भवती पत्नी द्रौपदी कोमरा को प्रसव के लिए शासकीय अस्पताल भानुप्रतापपुर लेकर पहुंचे। वहां डॉक्टरों ने आवश्यक जांच व सोनोग्राफी कराने की सलाह दी। रिपोर्ट के आधार पर डॉक्टरों ने परिजनों को बताया कि गर्भ में पानी की मात्रा कम होने के कारण सामान्य प्रसव संभव नहीं है और मरीज को जिला अस्पताल रेफर करना पड़ेगा। बेहतर और त्वरित इलाज की उम्मीद में परिजन 17 जून को द्रौपदी को निजी गौतम अस्पताल भानुप्रतापपुर ले गए। आरोप है कि अस्पताल में सिजेरियन ऑपरेशन के लिए परिजनों द्वारा बार-बार आग्रह किया जाता रहा, लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टर की अनुपस्थिति के कारण उन्हें लगभग 5 घंटे तक बेवजह इंतजार कराया गया। परिजनों की गुहार को दरकिनार करते हुए, 18 जून को कथित तौर पर नौसिखिया नर्सों द्वारा प्रसव कराया गया। इस गंभीर लापरवाही के चलते नवजात शिशु की मौके पर ही मौत हो गई और कुछ ही देर बाद मां ने भी दम तोड़ दिया।
नियमों की धज्जियां: न थाने को सूचना, न पोस्टमार्टम
घटना के बाद अस्पताल प्रबंधन का रवैया और भी संदिग्ध रहा। जच्चा-बच्चा की मौत की सूचना न तो स्थानीय पुलिस थाने को दी गई और न ही शवों का पोस्टमार्टम कराया गया। मामला जब मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से उजागर हुआ, तब जाकर जिला स्वास्थ्य विभाग की नींद टूटी। विभाग द्वारा गठित जांच टीम ने मामले की पड़ताल की, जिसके बाद गौतम अस्पताल के डिलीवरी वार्ड और सोनोग्राफी रूम को सील कर दिया गया।
कार्रवाई में दोहरा रवैया?
इस मामले में प्रशासन की कार्रवाई को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। भानुप्रतापपुर शासकीय अस्पताल की दो नर्सों को निलंबित कर दिया गया है और उनकी वेतन वृद्धि पर रोक लगा दी गई है। वहां के डॉक्टरों के खिलाफ भी कार्रवाई की तैयारी चल रही है। जिला स्वास्थ्य अधिकारी की जांच में यह स्पष्ट हो चुका है कि मौत की वजह निजी गौतम अस्पताल की लापरवाही थी। इसके बावजूद, अब तक दोषी डॉक्टरों और नर्सों पर कोई सख्त एफआईआर या कानूनी कार्रवाई नहीं हुई है। स्थानीय लोगों और परिजनों का आरोप है कि रसूखदार नेताओं के संरक्षण में गौतम अस्पताल को बिना किसी ठोस कार्रवाई के दोबारा खोलने की तैयारी की जा रही है।
न्याय की गुहार: दर-दर भटक रहा पीड़ित पति
मृतक महिला के पति कमलेश कोमरा अब न्याय पाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं। उनका कहना है कि उन्होंने जो असहनीय दर्द सहा है, वह किसी और परिवार को न सहना पड़े और स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार हो। मामले को लेकर सर्व आदिवासी समाज भी पीड़ित परिवार के समर्थन में आगे आया है, लेकिन प्रशासनिक सुस्ती के कारण अब तक परिवार को न्याय नहीं मिल सका है।
मानवाधिकार व जनजाति आयोग में शिकायत
स्वास्थ्य विभाग की जांच रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से दोषी पाए जाने के बावजूद पुलिस मामला दर्ज नहीं कर रही है। इस लचर रवैये से आहत होकर पीड़ित पति कमलेश कोमरा ने अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और अनुसूचित जनजाति आयोग में लिखित शिकायत दर्ज कराई है और दोषियों पर कड़ी से कड़ी कार्रवाई की मांग की है। क्या एक आदिवासी परिवार की जान की कोई कीमत नहीं है? कब तक रसूख के साये में लाचारों की जिंदगी से खिलवाड़ होता रहेगा और कब दोषियों को सलाखों के पीछे भेजा जाएगा?
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