भानुप्रतापपुर में विकास के नाम पर सरकारी खजाने की ‘डकैती’: पहले मनरेगा, अब खनिज न्यास निधि से 76 लाख रुपये का दोहरा आहरण; सो रहा है कांकेर प्रशासन!

भानुप्रतापपुर। कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर विकासखंड में भ्रष्टाचार का एक ऐसा खेल उजागर हुआ है जिसने प्रशासनिक निगरानी और सरकारी दावों की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं। कागजों पर ‘विकास’ की गंगा बहाने में माहिर अफसरों ने अब दोहरा भुगतान (Double Billing) का नया तरीका ढूंढ निकाला है। जो कार्य पूर्व में मनरेगा और जल संसाधन विभाग के तहत पूर्ण हो चुके हैं, उन्हीं कार्यों को दोबारा ‘जिला खनिज न्यास निधि’ (DMFT) से स्वीकृत कराकर 76.25 लाख रुपये की सरकारी राशि का खुलेआम बंदरबांट किया जा रहा है।
प्रशासनिक लापरवाही का आलम यह है कि बिना धरातल पर एक तगाड़ी मिट्टी डाले, ग्राम पंचायतों के माध्यम से लाखों रुपये का आहरण कर लिया गया और संबंधित निगरानी अधिकारियों ने आंखें मूंद लीं।

कागजों में चमकी नहरें, जमीनी हकीकत ‘सिफर’: जानिए कहां कितना हुआ खेल
स्थानीय ग्रामीणों और जांच में सामने आए तथ्यों के अनुसार, चार अलग-अलग स्थानों पर पहले से हुए कार्यों को नए सिरे से स्वीकृत दिखाकर 76.25 लाख रुपये की चपत लगाई गई है:
ग्राम पंचायत पेवारी: पेवारी तालाब नहर मरम्मत एवं लयनिंग कार्य – ₹19.70 लाख
ग्राम पंचायत रारवाही: हिरेसिंह के खेत से ज्ञानसिंह के खेत तक नहर मरम्मत – ₹18.84 लाख
ग्राम पंचायत परवी के आश्रित ग्राम जनकपुर (भाग-1): जीवन लाल के खेत से अर्जुन के खेत तक नहर लयनिंग – ₹19.07 लाख
ग्राम पंचायत परवी के आश्रित ग्राम जनकपुर (भाग-2): प्रहलाद के खेत से मोहन सोनवानी के खेत तक कार्य – ₹18.64 लाख

“आदिवासी अफसरों की छत्रछाया में आदिवासी किसानों की लूट”
आदिवासी नेता सीतेश हिडको ने प्रशासन की कार्यशैली पर सीधा प्रहार करते हुए कहा कि क्षेत्र के सीधे-साधे आदिवासी किसानों के हक पर डाका डाला जा रहा है। खेल का तरीका बेहद संगठित है—पहले जल संसाधन विभाग कागजी खानापूर्ति कर काम अधूरा छोड़ता है, फिर उसी काम को ग्राम पंचायत के खाते में डालकर खनिज न्यास निधि का बजट ठिकाने लगा दिया जाता है। आखिर उच्च अधिकारियों का संरक्षण मिले बिना इतना बड़ा फर्जीवाड़ा कैसे मुमकिन है?

‘कलम तो चलेगी’ का खुलासा: क्या अब जगेगा जिला प्रशासन?
यह कोई पहला मौका नहीं है जब जल संसाधन विभाग की कारगुजारियां सामने आई हों। पूर्व में भी जब विभाग ने मजदूरों की मजदूरी रोक रखी थी और कार्यों में भारी अनियमितता बरती थी, तब ‘कलम तो चलेगी’ की टीम ने खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। उस दौरान खबर के असर से बौखलाए विभाग को आनन-फानन में मजदूरों की बकाया मजदूरी का भुगतान करना पड़ा था।
अब सवाल यह उठता है कि जब पूर्व की अनियमितता जगजाहेर थी, तो उन्हीं स्थलों पर दोबारा फाइलें कैसे पास हो गईं? क्या कलेक्टर और जिला प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारी सिर्फ कागजी दस्तखत करने तक सीमित हैं? 76 लाख से अधिक के इस घोटाले पर जिला प्रशासन की चुप्पी कई गंभीर सवाल खड़े करती है। क्षेत्र की जनता अब इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग कर रही है।
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