कचना की ‘मिट्टी’ और सड्डू का ‘सोना’: जमीन के खेल की पूरी कहानी

छत्तीसगढ़ की सियासत में रायपुर विकास प्राधिकरण (RDA) की एक टाउन प्लानिंग स्कीम को लेकर भूचाल आया हुआ है। सत्ता, रसूख और बेशकीमती जमीन के इस त्रिकोण ने विपक्ष को बैठे-बिठाए सरकार पर हमला बोलने का बड़ा मौका दे दिया है।
कचना की ‘मिट्टी’ और सड्डू का ‘सोना’: जमीन के खेल की पूरी कहानी
रायपुर:- राजनीति और रियल एस्टेट का रिश्ता कोई नया नहीं है, लेकिन जब राजधानी के मास्टर प्लान में रेखाएं खिंचती हैं, तो अक्सर रसूखदारों की किस्मत चमक उठती है। ताजा मामला छत्तीसगढ़ सरकार के कद्दावर वन मंत्री केदार कश्यप की पत्नी शांति कश्यप से जुड़ी कंपनी ‘राधिका पैलेस प्राइवेट लिमिटेड’ के इर्द-गिर्द घूम रहा है।
रायपुर विकास प्राधिकरण (RDA) द्वारा लाई गई ‘लाभांडी-कचना-सड्डू नगर विकास योजना’ के तहत भूखंडों के पुनर्गठन और अंतिम आवंटन की सूची जारी होते ही सियासी पारा चढ़ गया।
आरोप क्या हैं?
कांग्रेस नेता और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. राकेश गुप्ता ने दस्तावेजों का हवाला देते हुए राज्य के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर बेहद तीखे आरोप लगाए हैं
1. अंदरूनी जमीन के बदले प्राइम लोकेशन: कंपनी के पास कचना के नालापारा इलाके में करीब 1.33 एकड़ जमीन दर्ज थी। आरोप है कि संकरी गलियों वाली इस कम कीमत की जमीन के बदले सड्डू क्षेत्र में प्लॉट नंबर 25 (लगभग 23,327 वर्गफीट / 2,168 वर्गमीटर) प्रस्तावित कर दिया गया।
(2 ) 20 करोड़ रुपये का खेल: प्रस्तावित प्लॉट 150 फीट चौड़ी प्रस्तावित मुख्य सड़क (MR-43) के ठीक सामने है। शिकायतकर्ता का दावा है कि इस महामार्ग के विकास के बाद बाजार भाव 10,000 रुपये प्रति वर्गफीट तक पहुंचेगा, जिससे इसकी कीमत 20 से 23 करोड़ रुपये आंकी जा रही है।
(3 ). कानून की अनदेखी (धारा 50 का पेंच): छत्तीसगढ़ नगर तथा ग्राम निवेश अधिनियम, 1973 की धारा 50 के मुताबिक, भू-स्वामी को उसकी मूल जमीन के आसपास ही रिअरेंज्ड प्लॉट मिलना चाहिए। मगर यहां मूल जमीन से लगभग 1 किलोमीटर दूर दूसरे गांव/क्षेत्र (सड्डू) में मुख्य मार्ग का बेशकीमती प्लॉट थमा दिया गया।
4. आम बनाम खास का भेदभाव: आरोप यह भी है कि जिन आम भू-स्वामियों की जमीनें मुख्य मार्ग पर थीं, उन्हें अंदरूनी और कमर्शियली कमजोर कोनों में धकेल दिया गया, जबकि मंत्री की पत्नी की कंपनी को वीआईपी ट्रीटमेंट मिला।
कंपनी से मंत्री का कनेक्शन
शिकायतकर्ता ने वर्ष 2023 के चुनावी शपथपत्र का हवाला देते हुए दावा किया है कि शांति कश्यप ‘राधिका पैलेस प्राइवेट लिमिटेड’ में निदेशक हैं और उनकी हिस्सेदारी (शेयर) दर्ज है। जब सत्ताधारी कैबिनेट मंत्री के घर का सीधा तार कंपनी से जुड़ता है, तो विपक्ष के लिए यह सिर्फ एक प्रशासनिक त्रुटि नहीं, बल्कि सीधा ‘हितों का टकराव’ (Conflict of Interest) बन जाता है।
प्राधिकरण और बचाव का पक्ष
आरडीए (RDA) और प्रशासन का इस मामले में रुख बेहद नपा-तुला है:
यह अंतिम फैसला नहीं, प्रस्ताव है: आरडीए के अधिकारियों का कहना है कि यह नगर विकास योजना के तहत प्रस्तावित प्रारूप है, जिसे सार्वजनिक कर ‘दावा-आपत्ति’ (Claims & Objections) मंगाई गई हैं।
समिति करेगी परीक्षण: नियमानुसार जो भी आपत्तियां आएंगी, सक्षम समिति दस्तावेजों और नियमों की कसौटी पर उनकी जांच करेगी। आरडीए का यह भी तर्क रहता है कि बड़े लैंड पार्सल के पुनर्गठन में तकनीकी मानकों के आधार पर ही लेआउट तय होते हैं।
विकास की आड़ में सत्ता का ‘प्लॉट’
छत्तीसगढ़ की राजनीति में यह मामला सिर्फ 23 हजार वर्गफीट जमीन का नहीं, बल्कि ‘पारदर्शिता के दावों’ की साख का इम्तिहान बन गया है। जब एक आम किसान या नागरिक अपनी पैतृक जमीन के अधिग्रहण या पुनर्गठन में दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते चप्पलें घिस देता है, तब किसी रसूखदार कंपनी को कचना के नाले से उठाकर 150 फीट चौड़ी सड़क पर 20 करोड़ के फ्रंट प्लॉट का प्रस्ताव मिलना जनता के गले आसानी से नहीं उतरता।
अब गेंद सरकार और आरडीए के पाले में है। यदि दावा-आपत्ति की यह प्रक्रिया सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई, तो यह सियासी आग आने वाले दिनों में और भड़केगी। निष्पक्ष जांच और नियमों के दायरे में की गई समीक्षा ही यह तय करेगी कि यह वाकई एक तकनीकी नियोजन था या फिर सत्ता की छाया में बुना गया कोई ‘स्पेशल पैकेज’|
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