मलाई में डूबी ‘स्वेच्छानुदान’: दो ट्रकों और स्कॉर्पियो के मालिक को मिली ‘गरीबी’ की 60 हजार सहायता!

कांकेर। प्रदेश सरकार की ‘स्वेच्छानुदान निधि’ का मकसद तो उन गरीबों की मदद करना है जो इलाज या बच्चों की पढ़ाई के लिए पाई-पाई को तरसते हैं। लेकिन कांकेर जिले में जो खेल सामने आया है, उसे देखकर जनता के पेट में मरोड़ उठना तय है। नया रायपुर अटल नगर से 24 मार्च 2026 को जारी सरकारी खजाने के दरवाजे कुछ ऐसे ‘जरूरतमंदों’ के लिए खुले, जिनकी ठाट-बाट देखकर आम आदमी भी पानी मांगने लगे।
मामला कांकेर के जगन्नाथ साहू और उनके कुनबे का है। जगन्नाथ साहू ने खुद के नाम, अपने पिता बोधन साहू और भतीजे कुंदन साहू के नाम पर शिक्षा और इलाज के बहाने 20-20 हजार रुपये यानी कुल 60 हजार रुपये की ‘स्वेच्छानुदान’ डकार ली। अब जरा इन ‘गरीब’ महाशय की हैसियत भी जान लीजिए— दो-दो सड़कों पर दौड़ते भारी-भरकम ट्रक, दरवाजे पर खड़ी चमचमाती स्कॉर्पियो और खुद को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) समाज का ‘प्रदेश अध्यक्ष’ बताने वाला रोब-दाब!
सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी खजाने की नजर में दो ट्रकों और स्कॉर्पियो का मालिक ‘आर्थिक रूप से कमजोर’ है? या फिर मंत्रियों के जनसंपर्क कोष की पात्रता का पैमाना अब गाड़ियों और रसूख से तय होने लगा है?

आरक्षण विरोध का खुला ‘राज’: वफादारी की मिली भारी कीमत?
कांकेर, दुर्गूकोंदल, भानुप्रतापपुर, अंतागढ़ से लेकर पखांजूर तक कई असली जरूरतमंद सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते चप्पलें घिस रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ ओबीसी समाज के कुछ पदाधिकारियों की जेबें भाजपा सरकार के मंत्रियों की ‘मेहरबानी’ से गरम हो रही हैं।
अब समझ आ रहा है कि आखिर ओबीसी समाज के आरक्षण प्रदर्शन और रैलियों की हवा निकालने की कोशिशें क्यों की जा रही थीं। जब समाज के नाम पर मलाई काटने वाले नेताओं और उनके रिश्तेदारों के खातों में सरकारी खजाने से 20-20 हजार की ‘खुराक’ सीधी पहुंच रही हो, तो वे समाज की लड़ाई लड़ने के बजाय सरकार की चारण वंदना ही करेंगे।
जनता पूछ रही कड़े सवाल:
क्या मंत्रियों की स्वेच्छानुदान निधि केवल चहेते नेताओं और रसूखदारों को रेवाड़ी की तरह बांटने के लिए है?
क्या जांच अधिकारी आंखों पर पट्टी बांधकर रिपोर्ट बनाते हैं, जिन्हें दरवाजे पर खड़ी स्कॉर्पियो और दो ट्रक नजर नहीं आए?
इलाज और पढ़ाई के नाम पर अपात्रों को बांटी गई इस राशि की वसूली कब होगी?
गरीबों के हक पर डाका डालकर अपात्रों की जेब भरने का यह कारनामा अब सीधे मंत्रियों की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान खड़ा कर रहा है। देखना यह है कि इस बड़े खुलासे के बाद शासन-प्रशासन की तंद्रा टूटती है या ‘अपने लोगों’ को रेवाड़ियां बांटने का यह खेल यूं ही जारी रहेगा।
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