बंदूक छोड़ थामे रंग: मुख्यधारा में लौटे नक्सलियों की ‘पहली होली’, अपनों के बीच मना रहे खुशियों का त्योहार

भानुप्रतापपुर। बस्तर के घने जंगलों में कभी गोलियों की गूंज और बारूद की गंध के बीच रहने वाले पूर्व नक्सलियों के लिए इस बार की होली किसी उत्सव से कहीं बढ़कर थी। हिंसा का रास्ता छोड़ और शासन की पुनर्वास नीति से प्रभावित होकर आत्मसमर्पण करने वाले युवाओं ने आज मुल्ला चौगेल पुनर्वास केंद्र में अपने जीवन की पहली ‘मुख्यधारा वाली होली’ मनाई। भानुप्रतापपुर थाना प्रभारी रामेश्वर देशमुख भी आत्मसर्मपण नक्सलियों के साथ किया नृत्य।

लाल आतंक का साया हटा, अब चेहरे पर गुलाल
कभी जिन हाथों ने अनजाने में एके-47 और आईईडी (IED) जैसे घातक हथियार थामे थे, आज उन हाथों में अबीर-गुलाल और पिचकारी नजर आई। पुनर्वास केंद्र में आयोजित इस होली मिलन समारोह में सरेंडर कर चुके इन युवाओं ने जमकर होली खेली। वर्षों बाद वे बिना किसी डर या सुरक्षा के साये के, खुले आसमान के नीचे अपनों के गले मिले और खुशियाँ बांटीं।

बुराई पर अच्छाई की जीत का जीवंत उदाहरण
होली के इस पावन पर्व पर इन युवाओं का उत्साह यह संदेश दे रहा है कि “बुराई पर अच्छाई की जीत” केवल पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वास्तविकता में भी संभव है। शासन की पुनर्वास नीति का उद्देश्य यही है कि भटके हुए लोग समाज की मुख्यधारा में घुल-मिल सकें और एक गरिमामय जीवन जी सकें।
बस्तर की बदलती तस्वीर
बस्तर के बदलते सामाजिक परिदृश्य में इसे एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। सुरक्षा बलों और पुनर्वास टीम के सदस्यों ने भी इन युवाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर होली खेली। हमारी टीम ने भी आत्मसमर्पित नक्सलियों के साथ रंग-गुलाल लगाकर इस खुशी को साझा किया, जिससे उनके मन में समाज के प्रति विश्वास और गहरा हुआ।

मुख्य आकर्षण:
पहली होली: सरेंडर के बाद सामाजिक परिवेश में पहली बार मनाया गया त्योहार।
नया संकल्प: हथियारों की जगह रंगों को अपनाकर नई शुरुआत का वादा।
सामुदायिक मेलजोल: पुलिस प्रशासन और स्थानीय टीम के साथ मिलकर मनाया जश्न।
“आज की होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि बस्तर के उन युवाओं के लिए एक नए जीवन का उदय है जिन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़कर शांति और विकास को चुना है।”
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