सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: बस्तर में ‘ग्राम सभा’ की स्वायत्तता बरकरार, अवैध धर्मांतरण रोकने के लिए बोर्ड लगाने को माना वैध

कांकेर। बस्तर के जनजातीय क्षेत्रों में अवैध धर्मांतरण और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में सर्वोच्च न्यायालय ने एक बड़ा और दूरगामी फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के उस निर्णय पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी है, जिसमें ग्राम सभाओं द्वारा बाहरी पादरियों और धर्मांतरण गतिविधियों पर रोक लगाने हेतु चेतावनी बोर्ड लगाने को सही ठहराया गया था।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलें सुनने के बाद ‘दिग्बल तांडी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य’ मामले में दायर अपील को खारिज कर दिया।
ग्राम सभाओं की सांस्कृतिक चेतना की जीत
यह पूरा विवाद उन ग्राम सभाओं के निर्णय से शुरू हुआ था, जिन्होंने अपने गांवों के प्रवेश द्वार पर बोर्ड लगाकर बाहरी धार्मिक प्रचारकों और प्रलोभन आधारित गतिविधियों के प्रवेश पर नियंत्रण की सूचना दी थी। याचिकाकर्ताओं ने इसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी थी, जिसे न्यायालय ने स्वीकार नहीं किया।
“धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ प्रलोभन का अधिकार नहीं”
न्यायालय के इस रुख से यह स्पष्ट हो गया है कि:
अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार किसी को बल, प्रलोभन या कपट से धर्मांतरण कराने की छूट नहीं देता।
पेसा कानून (PESA) और संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत ग्राम सभाओं को अपनी परंपरा, संस्कृति और सामाजिक ताने-बाने की रक्षा करने का पूर्ण अधिकार है।
यदि ग्राम सभा को लगता है कि संगठित गतिविधियों से गांव की शांति और सांस्कृतिक संरचना खतरे में है, तो वह संवैधानिक ढांचे के भीतर एहतियाती कदम उठा सकती है।
बस्तर की आत्मा की आवाज: देवेंद्र टेकाम
धर्मांतरण विरोधी अभियान में सक्रिय जिला पंचायत सदस्य देवेंद्र टेकाम ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा, “यह केवल कानूनी जीत नहीं है, बल्कि बस्तर की आत्मा की पुष्टि है। हमारी आंगा-देव परंपरा, बूढ़ा देव की आराधना और गोटुल व्यवस्था हजारों वर्षों से चली आ रही है। प्रलोभन और आर्थिक सहायता के नाम पर परिवारों को बांटने और सामाजिक दरारें पैदा करने की कोशिशों को अब वैधानिक प्रतिरोध मिला है।”
उन्होंने आगे कहा कि ग्राम स्वायत्तता अब केवल कागजों तक सीमित नहीं है। न्यायालय ने यह स्वीकार कर लिया है कि सांस्कृतिक आत्मरक्षा के लिए ग्राम सभाएं अपनी शक्तियों का प्रयोग कर सकती हैं।
सामाजिक विघटन पर कड़ा संदेश
इस फैसले के बाद यह संदेश साफ है कि जनजातीय क्षेत्रों में ‘संगठित और संरचित’ धर्मांतरण गतिविधियां, जो सामाजिक संतुलन बिगाड़ती हैं, अब ग्राम सभाओं के सीधे हस्तक्षेप के दायरे में होंगी। टेकाम ने स्पष्ट किया कि विरोध किसी समुदाय विशेष के प्रति नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया के विरुद्ध है जो आदिवासियों की जड़ों को कमजोर करती है।
Live Cricket Info





