भ्रष्टाचार की ‘लीपापोती’: 7 माह बाद भी ठंडे बस्ते में दुर्गुकोंदल स्कूल मरम्मत घोटाले की जांच

भानुप्रतापपुर। विकासखंड दुर्गुकोंदल में शिक्षा के मंदिरों के नाम पर हुए करोड़ों के भ्रष्टाचार का मामला अब प्रशासनिक फाइलों में दफन होता नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री स्कूल जतन योजना, विशेष केंद्रीय मद और समग्र शिक्षा मद के तहत हुए निर्माण कार्यों में अनियमितता के खिलाफ युवाओं का आक्रोश एक बार फिर उबलने को तैयार है। हैरानी की बात यह है कि अर्ध-नग्न प्रदर्शन और कार्यालय घेराव के 7 महीने बीत जाने के बाद भी जांच एक इंच आगे नहीं बढ़ी है।

अधिकारियों का संरक्षण या जांच से डर?
क्षेत्र के युवाओं का आरोप है कि ठेकेदारों ने विभागीय अधिकारियों के साथ सांठगांठ कर मरम्मत के नाम पर केवल ‘कागजी खानापूर्ति’ की है। घटिया निर्माण और भ्रष्टाचार के पुख्ता प्रमाण होने के बावजूद अब तक दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की गई है। आंदोलनकारियों का कहना है कि प्रशासन शायद किसी बड़े जनांदोलन का इंतजार कर रहा है।

लोक निर्माण विभाग और बीईओ के बीच फंसी फाइल
मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू विभागों के बीच चल रही ‘नूराकुश्ती’ है। लोक निर्माण विभाग के कार्यपालक अभियंता महेंद्र कश्यप का कहना है कि: खंड शिक्षा अधिकारी दुर्गुकोंदल को स्कूलों की सूची, बिल और एमबी उपलब्ध कराने के लिए कई बार पत्राचार किया जा चुका है। लेकिन बीईओ कार्यालय द्वारा दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं, जिसके कारण तकनीकी जांच पूरी तरह प्रभावित हो रही है। यह स्थिति साफ इशारा करती है कि कहीं न कहीं साक्ष्यों को छिपाने या जांच को जानबूझकर लटकाने की कोशिश की जा रही है।

नग्न प्रदर्शन की चेतावनी, प्रशासन मौन
बता दें कि कुछ समय पूर्व भ्रष्टाचार के खिलाफ ब्लॉक के युवाओं ने अर्धनग्न होकर प्रदर्शन किया था और चेतावनी दी थी कि यदि जांच में पारदर्शिता नहीं बरती गई, तो वे पूर्ण नग्न प्रदर्शन के लिए बाध्य होंगे। 7 महीने का लंबा समय बीत जाना प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।
- मुख्य सवाल:
करोड़ों के गबन की फाइल आखिर किसके दबाव में रुकी है?
बीईओ कार्यालय द्वारा दस्तावेज उपलब्ध न कराना क्या सीधे तौर पर दोषियों को बचाने का प्रयास है?
क्या मुख्यमंत्री की महत्वाकांक्षी योजना में भ्रष्टाचार करने वालों पर शासन का हंटर चलेगा?
अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस मामले में सुध लेता है या फिर युवाओं को एक बार फिर सड़कों पर उतरकर उग्र आंदोलन के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
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