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बालोद वन विभाग घोटाला: रक्षकों ने ही उजाड़ा जंगल

छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में वन विभाग के आला अधिकारियों द्वारा पद के दुरुपयोग और बेशकीमती लकड़ियों की तस्करी का एक बड़ा मामला उजागर हुआ है। आरोप है कि तत्कालीन डीएफओ (DFO) के संरक्षण में रेंजर और अन्य कर्मचारियों ने सरकारी संसाधनों का उपयोग कर अपने निजी स्वार्थ के लिए जंगलों की कटाई करवाई।
प्रमुख आरोप और कार्यप्रणाली
शिकायत के अनुसार, यह कोई साधारण चोरी नहीं थी, बल्कि एक सुव्यवस्थित तरीके से अंजाम दिया गया “सिंडिकेट” था:

• अवैध कटाई: डौंडी परिक्षेत्र के बीटेझर बीट से बेशकीमती सागौन के पेड़ों को काटा गया।
• सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग: चौंकाने वाली बात यह है कि लकड़ियों को ढोने के लिए विभाग की उड़नदस्ता (Flying Squad) गाड़ी का इस्तेमाल किया गया।
• सरकारी डिपो का इस्तेमाल: अवैध रूप से काटी गई लकड़ियों को पहले सुरक्षित तरीके से वन विभाग के काष्ठागार (Depot) लाया गया। वहां से इन्हें आरा-मिल भेजा गया ताकि फर्नीचर के लिए ‘चिरान’ (लकड़ी की पट्टियां) तैयार की जा सकें।
• निजी फर्नीचर निर्माण: इन लकड़ियों से अधिकारियों के घरों के लिए सोफे, टी-टेबल, ड्रेसिंग टेबल और अन्य विलासिता का सामान तैयार करवाया जा रहा था।
जांच की आंच: रायपुर से पहुंची टीम
मामले की गंभीरता को देखते हुए जब इसकी शिकायत रायपुर स्थित वरिष्ठ कार्यालय में की गई, तो विभाग में हड़कंप मच गया।

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1. छापेमारी और जब्ती: रायपुर से आई विशेष टीम ने बालोद के काष्ठागार और संबंधित कारपेंटर के ठिकाने पर दबिश दी।
2. सबूत बरामद: टीम ने वहां से भारी मात्रा में सागौन की लकड़ी और अधबने फर्नीचर जब्त किए हैं, जो इस अवैध खेल की पुष्टि करते हैं।
3. नामजद संलिप्तता: जांच में मुख्य रूप से तत्कालीन डीएफओ अभिषेक अग्रवाल, डौंडी रेंजर जीवन लाल भोंडेकर और बीट गार्ड ईश्वर साहू के नाम सामने आए हैं।

अधिकारियों की भूमिका पर सवाल
जांच में यह संकेत मिले हैं कि निचले स्तर के कर्मचारियों ने बड़े अधिकारियों को खुश करने के लिए या उनके सीधे आदेश पर इस अवैध तस्करी को अंजाम दिया। सरकारी गाड़ी और सरकारी डिपो का उपयोग यह दर्शाता है कि इन अधिकारियों को प्रशासन का कोई भय नहीं था।”

वर्तमान स्थिति
फिलहाल विभाग ने जब्त लकड़ियों को अपने कब्जे में ले लिया है और मामले की विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जा रही है। स्थानीय स्तर पर मांग उठ रही है कि दोषी अधिकारियों पर केवल विभागीय कार्रवाई न होकर, क्रिमिनल केस (FIR) दर्ज किया जाए ताकि भविष्य में वनों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

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