बस्तर की सुरीली गूंज: छोटे से गांव चौगेल से निकलकर छत्तीसगढ़ी सिनेमा के बड़े पर्दे तक पहुंचीं बबीता गोटी

भानुप्रतापपुर। छत्तीसगढ़ी फिल्म जगत में इन दिनों एक नई प्रतिभा अपनी सुरीली आवाज से श्रोताओं का दिल जीत रही है। उत्तर बस्तर कांकेर के एक छोटे से गांव चौगेल की रहने वाली बबीता गोटी ने अपनी मेहनत और लगन के दम पर संगीत के क्षेत्र में एक नई मिसाल पेश की है। फिल्म ‘धनेश की आराधना’ के साथ उनका पार्श्व गायन (Playback Singing) का सफर शुरू हो चुका है, जहाँ उनके गाए पाँचों गीत प्रदेशभर में धूम मचा रहे हैं।
शिक्षा और संगीत का अनूठा संगम
बबीता की शुरुआती शिक्षा गांव मुल्ला और भानुप्रतापपुर में हुई, जिसके बाद उन्होंने कांकेर से कॉलेज की पढ़ाई पूरी की। हालांकि, उनके भीतर संगीत की लौ बचपन से ही जल रही थी। अपनी इस प्रतिभा को निखारने के लिए उन्होंने चंडीगढ़ संगीत विश्वविद्यालय से संगीत की विधिवत शिक्षा प्राप्त की।
विरासत में मिला सुरों का ज्ञान
साक्षात्कार के दौरान बबीता ने बताया कि संगीत उनके खून में है। उन्हें गाने की प्रेरणा अपने माता-पिता—स्वर्गीय श्री मथुरा प्रसाद जी और श्रीमती देवकी गोटी—के साथ अपनी दादी दसाय बाई से मिली। दादा जी श्री जग्गू सिंह गोटी का आशीर्वाद उनके साथ रहा। स्कूल के दिनों से ही शिक्षकों और दोस्तों से मिले प्रोत्साहन ने उन्हें बड़े सपने देखने की ताकत दी।
’धनेश की आराधना’ में बिखेरा आवाज का जादू
अपनी पहली फिल्म के अनुभव को साझा करते हुए बबीता ने बताया कि उन्होंने इस फिल्म में कुल 5 गीत गाए हैं। रायपुर के श्रेष्ठ स्टूडियो में रिकॉर्ड हुए इन गानों को दर्शक काफी पसंद कर रहे हैं। उनके प्रमुख गीत हैं:
देखथ रथों तोर रद्दा (सबसे पसंदीदा गीत)
सुन मोरे सजना
नदिया के पानी
मोला रे संगी लागत हावे
कहा उड़ागे रे ए मोर मैना
इन गीतों का फिल्मांकन बस्तर और आसपास की खूबसूरत वादियों जैसे संबलपुर, भीरागांव, बोगर और हाटकोंदल जलाशय में किया गया है।

”एक छोटे से गाँव से रायपुर के बड़े स्टूडियो तक पहुँचना आसान नहीं था, लेकिन परिवार के सपोर्ट और चंडीगढ़ की शिक्षा ने मुझे आत्मविश्वास दिया।” — बबीता गोटी
सफलता का श्रेय और भविष्य की राह
बबीता अपनी सफलता का श्रेय मोहित साहू और प्रसिद्ध निर्देशक प्रणव झा को देती हैं, जिन्होंने ‘एन माही यूट्यूब चैनल’ के माध्यम से उन्हें यह बड़ा मंच प्रदान किया। भविष्य की योजनाओं पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि वे संगीत के जरिए छत्तीसगढ़ी कला और संस्कृति को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाना चाहती हैं। बबीता गोटी की यह प्रेरणादायक यात्रा यह साबित करती है कि यदि हुनर और हौसला साथ हो, तो बस्तर के जंगलों से निकलकर बड़े पर्दे तक का सफर भी तय किया जा सकता है।
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